Sunday, March 14, 2010

किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए
3 मार्च : आई वांट यू टू बी हैप्पी डे
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NDNDतनाव से भरी भागती-दौड़ती इस जिंदगी में किसी के चेहरे पर खुशी बिखेरना शायद आसमान के तारे तोड़ना जितना कठिन काम है, लेकिन दुनिया में कई ऐसे लोग हैं, जो दूसरों को खुशी देना अपने जीवन का लक्ष्य बनाए हुए हैं।बच्चों के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठन ‘बालमन’ की संयोजक अन्वेषा खली ने बताया कि दुनिया के सितमों के मारे बच्चों के चेहरे पर खुशी देखना शायद जीवन का सबसे खुशनुमा पल होता है।अन्वेषा ने कहा ‘दुनिया में बहुत से बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें प्यार करना तो दूर कोई दो शब्द ठीक से भी नहीं बोलता। हम कोशिश करते हैं कि ऐसे बच्चों को आत्मसम्मान और खुशी दे सकें।’ अन्वेषा ने कहा ‘मैं लोगों से अपील करती हूँ कि वे जिंदगी में एक बार अनाथ और बेसहारा बच्चों को खुशी देने की कोशिश करें। इस खुशी को आप लाखों रुपए खर्च करके भी नहीं खरीद सकते।’ दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा और कई संस्थाओं के साथ स्वयंसेवक के तौर पर काम करने वाली पीतमपुरा निवासी प्रगति दोषी ने बताया कि जरूरतमंदों की मदद करना दोस्तों के साथ पार्टी करने से ज्यादा खुशी देता है।कुछ पश्चिमी देशों में तीन मार्च को ‘आई वांट यू टू बी हैप्पी डे’’ मनाया जाता है। हमारे देश में इस दिन का चलन नहीं है लेकिन दूसरों को खुशी देने के लिए समर्पित इस दिन का महत्व जरूर समझ में आता है।प्रगति ने कहा ‘मैं किसी भी खुशी के मौके पर पार्टी नहीं करती, बल्कि इसकी जगह पर मैं जरूरतमंद लोगों की जरूरतें पूरी करने में विश्वास रखती हूँ। मैं शहर के कई अनाथालयों में जाकर वहाँ बच्चों के बीच खिलौने और कपड़े बाँटती हूँ।’ प्रगति ने कहा ‘कई बच्चों को खिलौने देकर मैंने उनके चेहरे की खुशी को संजोकर रखने के लिए अपने कैमरे का उपयोग किया। इन फोटो ने मुझे दो प्रतियोगिताओं में जीत भी दिलाई।’ कुछ ऐसी ही कहानी शासकीय कर्मचारी आरके धोटे की भी है। ‘आसरा’ संस्था के लंबे समय से स्वयंसेवक धोटे अपना हर अवकाश संस्था में रह रहे बुजुर्गों की सेवा को समर्पित करते हैं।धोटे ने बताया ‘मैंने हमेशा से बुजुर्गों की सेवा में दुनिया की खुशी देखी। इन बुजुर्गों के साथ थोड़ा समय बिताकर उनके सुख-दुख की बात करना उनके लिए सबसे बड़ी खुशी है।’ धोटे ने बताया ‘कभी-कभी बुजुर्ग अपने परिवार को याद कर परेशान हो जाते हैं। ऐसे में उनके साथ बैठना बहुत जरूरी हो जाता है। हम अगर किसी को खुशी देते हैं, तो इसमें हमारा कुछ नहीं जाता, लेकिन उनके चेहरे पर आई मुस्कान जो सुकून देती है, उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल का काम है।’
पटेल और शास्त्री जी के प्रेरक प्रसंग
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सरदार की कर्तव्य के प्रति ईमानदारीपवन कुमार पाटीदारसरदार पटेल वास्तव में अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदार थे। उनके इस गुण का दर्शन हमें सन् 1909 की इस घटना से लगता है। वे कोर्ट में केस लड़ रहे थे, उस समय उन्हें अपनी पत्नी की मृत्यु का तार मिला। पढ़कर उन्होंने इस प्रकार पत्र को अपनी जेब में रख लिया जैसे कुछ हुआ ही नहीं। दो घंटे तक बहस कर उन्होंने वह केस जीत लिया। बहस पूर्ण हो जाने के बाद न्यायाधीश व अन्य लोगों को जब यह खबर मिली कि सरदार पटेल की पत्नी का निधन हुआ है। तब उन्होंने सरदार से इस बारे में पूछा तो सरदार ने कहा कि उस समय मैं अपना फर्ज निभा रहा था जिसका शुल्क मेरे मुवक्किल ने न्याय के लिए मुझे दिया था। मैं उसके साथ अन्याय कैसे कर सकता था। ऐसी थी उनकी कर्तव्यपरायणता और शेर जैसा कलेजा।शास्त्री जी की सादगीसौ. भारती मंडलोईएक बार हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को विदेश यात्रा पर जाना था। उनके पत्नी व पुत्र ने सोचा कि शास्त्री जी के लिए नया कोट बनवा दिया जाए क्योंकि उनका कोट काफी पुराना हो चुका था।बाजार से एक बढ़िया धारी वाला काले कोट का कपड़ा मँगवाया गया और दर्जी को बुलाकर शास्त्रीजी के सामने खड़ा कर‍ दिया। दर्जी ने शास्त्री जी का नाप लेकर अपनी डायरी में नोट कर लिया और कोट के कपड़े का लिफाफा लेकर जाने लगा तो शास्त्री जी ने उससे धीरे से कुछ कहा। कुछ दिनों पश्चात जब टेलर कोट का लिफाफा लेकर आया तो उसमें से कोट निकाला गया। पर यह क्या? उसमें तो वही पुराना कोट निकला जो शास्त्रीजी पहनते थे। उनकी पत्नी व पुत्र यह देखकर दंग रह गए पर वह दर्जी से क्या पूछते?दर्जी के जाने के बाद उनके पुत्र ने पूछा - 'बाबूजी यह क्या माजरा है? तो वह मुस्कुराते हुए बोले कि अभी तो मेरा पुराना कोट ही पहनने लायक है। इसलिए वह कपड़ा मैंने वापस करवा कर उन पैसों को जरूरतमंद विद्यार्थियों में बँटवा दिया है। सादा जीवन के साथ ऐसे उच्च विचार थे हमारे शास्त्री जी के।
गिनीज बुक कैसे बनी?
सीख वाली कहानी
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सन 1951 की बात है। ह्यूज बीवर उन दिनों गिनीज ब्रेवरीज में काम करते थे। एक दिन वे अपने दोस्तों के साथ चिड़ियों का शिकार करने के लिए निकले। युवा शिकारियों का यह दल कुछ समझ पाता इससे पहले ही उनके सामने से चिड़ियाओं का एक झुंड बहुत तेजी से निकल गया। ह्यूज और उनके दोस्त हैरत में पड़ गए कि आखिर ये कौन सी चिड़ियाएँ है थीं जो इतनी तेजी से उड़ती हैं। कुछ का अंदाजा था कि वह बया जैसा कोई पक्षी था जबकि कुछ कह रहे थे कि वह तीतर से मिलती कोई प्रजाति थी। यह तय नहीं हो पाया कि आखिर वे कौन सी चिड़ियाएँ थीं। ह्यूज ने घर आकर यह पता लगाने के लिए किताबें अलटी-पलटी कि आखिर योरप का सबसे तेज उड़ने वाला पक्षी कौन सा है। कई किताबें उलटने के बाद भी उन्हें अपनी जिज्ञासा का उत्तर नहीं मिला। ह्यूज अपने काम में लगे रहे। 1954 में एक किताब में उन्होंने अपने प्रश्न का उत्तर पाया, यह भी कोई बहुत प्रामाणिक उत्तर नहीं था।इस पूरी घटना से ह्यूज बीवर के मन में यह बात आई कि कई लोगों के मन में इस तरह के प्रश्न उठते होंगे और उनका उत्तर न मिलने पर इन्हें कितनी निराशा होती होगी। ह्यूज ने यह विचार अपने मित्रों को सुनाया।मित्र ने उन्हें नोरिस और रॉस मॅक्विटर नाम के दो युवकों से मिलाया। ये दोनों लंदनClick here to see more news from this city में एक तथ्यों का पता लगाने वाली एजेंसी के लिए काम करते थे। ‍तीनों ने मिलकर 1955 में पहली गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्‍स निकाली और फिर धीरे-धीरे यह नई किताब लोगों को इतनी पसंद आने लगी कि इसकी प्रतियाँ हर साल बढ़ती गईं। आज इस रिकॉर्ड बुक में नाम दर्ज करवाने के लिए दुनियाभर के लोग उत्सुक रहते हैं और तरह-तरह के काम करते हैं। ह्यूज एक मुश्किल में पड़े और उससे एक नया रास्ता निकला। याद रहे, हर मुश्किल के पास सिखाने के लिए बहुत कुछ होता है।
सुभाषचन्द्र बोस : स्वतंत्रता के महानायक
सुभाषचन्द्र बोस जयंती पर विशेष
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- प्रो. माला ठाकुर
ND23 जनवरी 1897 का दिन विश्व इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। इस दिन स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक सुभाषचन्द्र बोस का जन्म कटक के प्रसिद्ध वकील जानकीनाथ तथा प्रभावतीदेवी के यहाँ हुआ। उनके पिता ने अँगरेजों के दमनचक्र के विरोध में 'रायबहादुर' की उपाधि लौटा दी। इससे सुभाष के मन में अँगरेजों के प्रति कटुता ने घर कर लिया। अब सुभाष अँगरेजों को भारत से खदेड़ने व भारत को स्वतंत्र कराने का आत्मसंकल्प ले, चल पड़े राष्ट्रकर्म की राह पर। आईसीएस की परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद सुभाष ने आईसीएस से इस्तीफा दिया। इस बात पर उनके पिता ने उनका मनोबल बढ़ाते हुए कहा- 'जब तुमने देशसेवा का व्रत ले ही लिया है, तो कभी इस पथ से विचलित मत होना।'
NDदिसंबर 1927 में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव के बाद 1938 में उन्हें कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया। उन्होंने कहा था- मेरी यह कामना है कि महात्मा गाँधी के नेतृत्व में ही हमें स्वाधीनता की लड़ाई लड़ना है। हमारी लड़ाई केवल ब्रिटिश साम्राज्यवाद से नहीं, विश्व साम्राज्यवाद से है। धीरे-धीरे कांग्रेस से सुभाष का मोह भंग होने लगा। 16 मार्च 1939 को सुभाष ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। सुभाष ने आजादी के आंदोलन को एक नई राह देते हुए युवाओं को संगठित करने का प्रयास पूरी निष्ठा से शुरू कर दिया। इसकी शुरुआत 4 जुलाई 1943 को सिंगापुर में 'भारतीय स्वाधीनता सम्मेलन' के साथ हुई। 5 जुलाई 1943 को 'आजाद हिन्द फौज' का विधिवत गठन हुआ। 21 अक्टूबर 1943 को एशिया के विभिन्न देशों में रहने वाले भारतीयों का सम्मेलन कर उसमें अस्थायी स्वतंत्र भारत सरकार की स्थापना कर नेताजी ने आजादी प्राप्त करने के संकल्प को साकार किया।12 सितंबर 1944 को रंगून के जुबली हॉल में शहीद यतीन्द्रदास के स्मृति दिवस पर नेताजी ने अत्यंत मार्मिक भाषण देते हुए कहा- 'अब हमारी आजादी निश्चित है, परंतु आजादी बलिदान माँगती है। आप मुझे खून दो, मैं आपको आजादी दूँगा।' यही देश के नौजवानों में प्राण फूँकने वाला वाक्य था, जो भारत ही नहीं विश्व के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। 16 अगस्त 1945 को टोक्यो के लिए निकलने पर ताइहोकु हवाई अड्डे पर नेताजी का विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और स्वतंत्र भारत की अमरता का जयघोष करने वाला, भारत माँ का दुलारा सदा के लिए, राष्ट्रप्रेम की दिव्य ज्योति जलाकर अमर हो गया।
'मातृभूमि का ऋण चुकाया'
आसमान में पराक्रम
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शिवकुमार गोयलपाकिस्तानी विमान भारतीय क्षेत्रों पर बम बरसाकर क्षतिग्रस्त करने पर तुले हुए थे। 3 सितंबर सन् 1965 को प्रात: छम्ब क्षेत्र में पाकिस्तान के कई अमेरिकी सैबर जेट विमानों को मँडराते देखा गया। स्क्वाड्रन लीडर श्री ट्रैवर कीलर छम्ब क्षेत्र में घुसने वाले पाक विमानों को मार गिराने के लिए नियुक्त थे। स्क्वाड्रन लीडर कीलर ने तुरंत लड़ाकू विमान से उड़ान भरी और पाकिस्तानी विमानों को घेर लिया। कीलर ने बड़ी कुशलता के साथ एक पाकिस्तानी सैबरजेट विमान को गोली का निशाना बनाया। दुश्मन का विमान आकाश में ही जलकर जमीन पर चकनाचूर होकर गिर पड़ा।वीर ट्रैवर कीलर ने जब पाकिस्तानी क्षेत्र में जाकर लड़ाकू विमान से आक्रमण किया, तब भी उन्होंने अपूर्व कुशलता का परिचय दिया। उन्होंने अपने विमान को आकाश में काफी ऊँचा उठाया, जिससे दुश्मन के विमान राडार द्वारा सूचना मिलने पर उनके विमान का पीछा करें। ज्यों ही पाक विमानों ने ट्रैवर कीलर के विमान का पीछा किया कि उन्होंने दुश्मन के एक विमान पर गोलियों की बौछार कर उसे मार गिराया। यह घटना कीलर के अपूर्व कुशलता एवं साहस का प्रतीक है। स्वाड्रन लीडर ट्रैवर कीलर के भाई स्क्वाड्रन लीडर डेंजिल कीलर ने भी 19 सितंबर, 1965 को सियालकोट क्षेत्र में पाकिस्तान के चार सैबर जेटों का पीछा किया। पाकिस्तानी और हिन्दुस्तानी विमानों में डटकर संघर्ष हुआ और वीर डेंजिल कीलर ने एक सैबर जेट को गोलियों का निशाना बनाकर ध्वस्त कर डाला।उसके साथ स्क्वाड्रन लीडर कपिल ने भी एक सैबर जेट का पीछा किया और उसे गोलियों से छलनी करके मार गिराया। कीलर बंधुओं का जन्म लखनऊClick here to see more news from this city के एक शिक्षित परिवार में हुआ था। उनके 78 वर्षीय पिता चार्ल्स कीलर लखनऊ के सेंट मैरीज विद्यालय में प्रधानाचार्य थे। कीलर बंधुओं के वयोवृद्ध वीर पिता ने जब यह समाचार सुना कि उनके पुत्रों ने देश की रक्षा करते हुए अपूर्व साहस का परिचय दिया है तो उनके मुख से निकल पड़ा - 'मेरे बेटों ने मातृभूमि का ऋण चुका दिया'डेंजिल कीलर को गोआ अभियान के अवसर पर शौर्य एवं कुशलता दिखलाने के लिए 'वायु सेना पदक' प्रदान किया गया था। ट्रैवर कीलर को पंद्रह हजार फुट की ऊँचाई पर जेट विमान के इंजिन जल जाने के बावजूद उसे कुशलतापूर्वक जमीन पर उतार लेने के उपलक्ष्य में सम्मानित किया गया था। भारत सरकार ने दोनों कीलर बंधुओं को वीर चक्र से सम्मानित किया।
अब्राहम लिंकन ने यह पत्र अपने बेटे के स्कूल प्रिंसिपल को लिखा था। लिंकन ने इसमें वे तमाम बातें लिखी थीं जो वे अपने बेटे को सिखाना चाहते थे। ये बातें सिर्फ किसी एक स्टूडेंट के लिए ही महत्वपूर्ण क्यों हो, सभी के लिए क्यों नहीं। सम्माननीय सर...
NDNDमैं जानता हूँ कि इस दुनिया में सारे लोग अच्छे और सच्चे नहीं हैं। यह बात मेरे बेटे को भी सीखना होगी। पर मैं चाहता हूँ कि आप उसे यह बताएँ कि हर बुरे आदमी के पास भी अच्छा हृदय होता है। हर स्वार्थी नेता के अंदर अच्छा लीडर बनने की क्षमता होती है। मैं चाहता हूँ कि आप उसे सिखाएँ कि हर दुश्मन के अंदर एक दोस्त बनने की संभावना भी होती है। ये बातें सीखने में उसे समय लगेगा, मैं जानता हूँ। पर आप उसे सिखाइए कि मेहनत से कमाया गया एक रुपया, सड़क पर मिलने वाले पाँच रुपए के नोट से ज्यादा कीमती होता है। आप उसे बताइएगा कि दूसरों से जलन की भावना अपने मन में ना लाएँ। साथ ही यह भी कि खुलकर हँसते हुए भी शालीनता बरतना कितना जरूरी है। मुझे उम्मीद है कि आप उसे बता पाएँगे कि दूसरों को धमकाना और डराना कोई अच्‍छी बात नहीं है। यह काम करने से उसे दूर रहना चाहिए।आप उसे किताबें पढ़ने के लिए तो कहिएगा ही, पर साथ ही उसे आकाश में उड़ते पक्षियों को धूप, धूप में हरे-भरे मैदानों में खिले-फूलों पर मँडराती तितलियों को निहारने की याद भी दिलाते रहिएगा। मैं समझता हूँ कि ये बातें उसके लिए ज्यादा काम की हैं।मैं मानता हूँ कि स्कूल के दिनों में ही उसे यह बात भी सीखना होगी कि नकल करके पास होने से फेल होना अच्‍छा है। किसी बात पर चाहे दूसरे उसे गलत कहें, पर अपनी सच्ची बात पर कायम रहने का हुनर उसमें होना चाहिए। दयालु लोगों के साथ नम्रता से पेश आना और बुरे लोगों के साथ सख्ती से पेश आना चाहिए। दूसरों की सारी बातें सुनने के बाद उसमें से काम की चीजों का चुनाव उसे इन्हीं दिनों में सीखना होगा।आप उसे बताना मत भूलिएगा कि उदासी को किस तरह प्रसन्नता में बदला जा सकता है। और उसे यह भी बताइएगा कि जब कभी रोने का मन करे तो रोने में शर्म बिल्कुल ना करे। मेरा सोचना है कि उसे खुद पर विश्वास होना चाहिए और दूसरों पर भी। तभी तो वह एक अच्छा इंसान बन पाएगा।ये बातें बड़ी हैं और लंबी भी। पर आप इनमें से जितना भी उसे बता पाएँ उतना उसके लिए अच्छा होगा। फिर अभी मेरा बेटा बहुत छोटा है और बहुत प्यारा भी। आपका अब्राहम लिंकन
NDNDदोस्तो, मेरा जन्म जयपुरClick here to see more news from this city में हुआ और यहीं मैं पला और बड़ा हुआ। स्कूल के दिनों से ही मैं पढ़ने में बहुत तेज स्टूडेंट नहीं था। और खासकर स्कूल जाने से मुझे बहुत चिढ़ होती थी। सुबह 6.30 बजे स्कूल जाना और दोपहर में 4 बजे तक वापस आना मुझे बहुत बोरिंग काम लगता था।इसके बजाय मुझे क्रिकेट खेलना बहुत ही अच्छा लगता था। मैं अपने पड़ोस में और चौगान स्टेडियम में जाकर क्रिकेट खेलने में खूब रुचि लेता था और बड़ा होकर क्रिकेटर ही बनना चाहता था। क्रिकेट में मेरी प्रैक्टिस भी खूब अच्छी थी और सीके नायडू ट्रॉफी के लिए मेरा सिलेक्शन भी लगभग हो गया था। पर जब घर पर सभी को यह बात मालूम हुई तो उन्होंने इसके लिए इजाजत नहीं दी। घर पर सभी को यह ठीक नहीं लगा कि मैं क्रिकेट खेलूँ। इस तरह मेरा क्रिकेट छूट गया।क्रिकेट छोड़ने के बाद मुझे ठीक तरह से ग्रेजुएशन करने को कहा गया। पता नहीं कुछ भारी-भरकम विषय भी मुझे दिला दिए गए ताकि मेरा ध्यान पढ़ाई में ही लगा रहे। वैसे अब मुझे लगता है कि पढ़ाई करने से मुझे बहुत सारी चीजों की समझ मिली वरना मैं किसी काम में आगे नहीं बढ़ पाता। पर ग्रेजुएशन के साथ ही मैंने एक्टिंग की तरफ भी ध्यान देना शुरू किया। पहले मैं कुछ नए कलाकारों के साथ एक्टिंग सीखने की कोशिश करने लगा। फिर मेरी मुलाकात नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) के एक शख्स से हुई। वे कॉलेजों में जाकर नाटक किया करते थे। मैं भी उनके साथ उनकी टीम में शामिल हो गया और स्टूडेंट्‍स के साथ कॉरिडोर में, क्लासरूम में और कैंटीन में ड्रामा करते हुए ही एक्टिंग के प्रति मेरी समझ बढ़ी और मैं इस दिशा में करियर को लेकर गंभीर हुआ।
बड़ा होने पर कोई डॉक्टर बन जाता है तो कोई एक्टर। बड़ा होने पर चाहे हम कुछ भी बन जाएँ पर सभी को अपने बचपन के दिनों की याद तो आती ही है। बचपन के दिन सबसे मजेदार होते हैं। इन दिनों की घटनाएँ बड़ा हो जाने पर ही कहीं ना कहीं याद आती ही है।
इसके बाद सीरियल और फिल्में मिलने लगी और फिर इरफान खान अभिनेता हो गए। फिल्मों में भी मैं अपने रोल को लेकर बहुत ज्यादा मेहनत करता हूँ। मुझे लगता है कि काम को दिल लगाकर करना चाहिए। यह बात आप सभी पाठकों के लिए भी जरूरी है। क्योंकि इन दिनों अगर आप दिल लगाकर पढ़ाई करेंगे तो अच्छे नंबरों के साथ अगली कक्षा में जाओगे। बड़ा होने पर कोई डॉक्टर बन जाता है तो कोई एक्टर। बड़ा होने पर चाहे हम कुछ भी बन जाएँ पर सभी को अपने बचपन के दिनों की याद तो आती ही है। बचपन के दिन सबसे मजेदार होते हैं। इन दिनों की घटनाएँ बड़ा हो जाने पर ही कहीं ना कहीं याद आती ही है।मैं अपने बचपन के दिनों को याद करता हूँ तो पिताजी के साथ शिकार खेलने जाने की यादें आती हैं। दोस्तो, जब मैं छोटा था तब जयपुर के आसपास घने जंगल थे। इन्हीं जंगलों में मेरे पिताजी हर सप्ताह शिकार के लिए जाते थे। मैं भी बहुत-सी बार उनके साथ गया हूँ। बचपन में मुझे जंगल में रात बिताना बहुत ही रोमांचक लगता था। वैसे बचपन में मुझे शूटिंग बिलकुल भी पसंद नहीं थी। यह प्रश्न मेरे मन में हमेशा आता था कि पिताजी जानवरों का शिकार क्यों करते हैं। पर यह बात पिताजी से पूछने की हिम्मत कभी नहीं हुई। बाद में मुझे पता लगा कि शिकार का शौक मेरे पिता ने उनके पिता से पाया था। जब भी मुझे डर लगता था तो वे मुझे बहादुर बनने को कहते थे। जब मैं 10 साल का था तब शिकार करने पर रोक लग गई। खैर, अब मैं देखता हूँ कि सभी के समझ में यह बात आ गई है कि हमारे आसपास के परिंदे और जानवर हमारे जीवन का हिस्सा हैं और इनका शिकार नहीं करना चाहिए। अब तो शिकार रोकने के लिए बहुत सख्‍त कानून भी बन गए हैं। यह अच्छी बात है। वैसे कभी भी किसी जंगल के दृश्य को देखकर मुझे अपने बचपन के दिनों की याद आ ही जाती है। आपका इरफान खान