पिता का उपहार है कन्या रत्न
जीवन के रंगमंच से
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-किसलय पंचोली
NDसमाज में कई भ्रांतियाँ इतनी गहरी जड़ें जमा लेती हैं कि वे मान्यताओं का विशालकाय बरगद नजर आती हैं। उन्हीं में से एक यह धारणा कि अगर लड़का नहीं पैदा हुआ तो वंश समाप्त हो जाएगा। दरअसल वंश क्या है? अपना अंश। पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे जीवंत रहता आनुवांशिक तंत्र। लड़का या लड़की दोनों ही माता-पिता के वैसे ही प्रतिनिधि हैं जैसे सिक्के के दो पहलू। चिट या पट। सिक्का उछालने पर हम ऐसा तो नहीं मानते कि चिट आए तो सही और पट आए तो गलत। या कि चिट आए तो सिक्का खरा और पट आए तो खोटा। हम सब इस बात को अच्छे से समझते हैं कि उछाले हुए सिक्के के गिरने पर दो ही बातें हो सकती हैं। और वे दोनों हैं बराबर बराबर। पचास-पचास प्रतिशत। या तो हेड या टेल।जितनी सरल है उपरोक्त संभावना उतनी ही सरल है यह बात भी कि होने वाली संतान लड़का होगी या लड़की। यह संभावना क्यों नहीं समझ में आती? क्यों कहा जाता है कि वंश सिर्फ लड़कों से चलता है? इस धारणा को कौन बल देता है? अब समय आ गया है कि इस तरह की घातक मान्यताओं पर फिर से विचार किया जाए। अब जबकि देश में शिक्षा का प्रसार तेजी से हो रहा है। विशेषकर लड़कियाँ लड़कों से बेहतर परिणामों के साथ विद्यालयीन शिक्षा में बाजी मार रही हैं। ऐसी स्थिति में इस बात को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाना चाहिए कि वंश की बरकरारी बेटा और बेटी दोनों से एक समान होती है।
NDआज विज्ञान द्वारा हमें भली भाँति ज्ञात है कि प्राकृतिक रूप से हर माँ अपनी हर संतान को समभाव से एक्स गुणसूत्र ही देती है। या कहें दे सकती है। दूसरी तरफ संयोगवश प्राकृतिक रूप से पिता से प्राप्त एक्स या वाई गुणसूत्र (क्रोमोसोम) के कारण ही संतान लड़का या लड़की होती है। यही प्रकृति की अनुपम व्यवस्था है। इस व्यवस्था के तहत यदि संतान में एक्स, एक्स गुणसूत्र आ गए तो कन्या रत्न और यदि एक्स, वाई आ गए तो कुमार रत्न!!ऐसे में यह मानना कितना हास्यास्पद है कि यदि माता से प्राप्त एक्स और पिता से प्राप्त वाई गुणसूत्रों के मिलान से पुत्र पैदा हुआ तो वंश सतत माना जाएगा। और यदि माता से प्राप्त एक्स और पिता से प्राप्त एक्स गुणसूत्रों के मिलान से पुत्री पैदा हो गई तो वंश समाप्त माना जाएगा! भई क्यों? अरे! इस तरह तो हम पिता द्वारा प्रदत्त एक्स गुणसूत्र का ही अपमान करते हैं। प्रकारांतर से यह सरासर पिता का ही अपमान करना हुआ।संतान का बेटा या बेटी होना संतान को पिता का प्राकृतिक, वंशानुगत उपहार है। उपहार जो संयोग से देता पिता है। निर्देशित ईश्वर करता है। बेटा या बेटी दोनों वंश को आगे बढ़ाते हैं। दोनों ही माता-पिता के बराबर के अंश होते हैं।जब सच्चाई इतनी सहज, सरल और निर्मल प्रांकुर है तो फिर भ्रांति क्यों कर बरगद बन गई? कदाचित यह सामाजिक व्यवस्था से कालांतर में उपजा पार्श्व प्रभाव है। साइड इफैक्ट। चूँकि लड़की को दूसरे घर ब्याह दिया जाता है। कन्यादान कहा जाता है। इसलिए यह माना जाने लगा कि कन्या विदा हुई तो वंश से संबंध खत्म। वंश समाप्त। वास्तव में यह एक सुंदर सामाजिक व्यवस्था की स्थूल, भौतिक, पदार्थवादी व्याख्या है। आनुवांशिक, वैज्ञानिक और आत्मिक व्याख्या नहीं है। पदार्थवादी व्याख्या, जिससे हर विदाई के बाद भ्रांति के बरगद में एक जड़ और लटकी प्रतीत होती है।भई कन्या गई तो विचार कीजिए साथ में एक्स एक्स गुणसूत्रों का वंश-बैलेंस भी लेकर गई। और बहू आई तो वह भी वैसा ही वंश-बैलेंस लेकर आई। इस तरह सामाजिक व्यवस्था में तो बराबरी का वंश-विनिमय हुआ। वंश समाप्त कहाँ हुआ? क्या आपका पुत्र या आपका दामाद अपने-अपने तथाकथित वंश को बिना आपकी क्या या बहू के सहयोग से आगे बढ़ा सकते हैं? बिल्कुल नहीं। यह बात इकलौती कन्या होने या इकलौते पुत्र होने पर भी सोलह आने सच है। वंशानुगति तो बहती नदी है। बहना उसका धर्म है। संतति उसके किनारे हैं। घाट हैं। एक ही नदी के इधर के घाट का पानी मीठा और उधर के घाट का कड़वा तो नहीं होता।तो क्यों न हम जहाँ कहीं यह सुनें कि बेटे के बिना गति नहीं होगी कि मरे बाद मुखाग्नि कौन देगा? कि पुत्र के न होने पर वंश समाप्त हो जाएगा। वहाँ उन्हें इस प्राकृतिक, वेद सम्मत और विज्ञान प्रमाणित सच्चाई से अवगत कराएँ कि ऐसा नहीं है। वंश कभी समाप्त नहीं होता है। दशा और दिशा भर बदल देता है। बेटा और बेटी दोनों से समान रूप से चलता है। अकेला बेटा होने पर भी और अकेली बेटी होने पर भी।
NDयही नहीं यदि तार्किक दृष्टि से परखा जाए तो जब कोई निसंतान दंपत्ति बच्चा गोद लेते हैं। तो वे एक तरह से वंश संरक्षण का पुनीत कार्य करते हैं। उनके न रहने के बाद दत्तक वंश की संतति ठीक उसी तरह पल्लवित होती रहती है जैसे सामान्य वंश की संतति। अगर प्रत्येक साधारण व्यक्ति इस बात को आत्मसात कर ले तो समाज से बहुत सी बुराइयाँ मिट सकती हैं। जैसे भ्रूण हत्या, लड़का लड़की में भेदभाव, दहेज प्रथा और संपत्ति के विवाद आदि।याद रखें वंश मतलब अंश। अंश कुछ भी हो लड़का या लड़की। हमेशा बढ़ाता है वंश।
Sunday, March 14, 2010
हिन्दी पढ़ने से दिमाग रहे सक्रिय
यूँ रहें स्वस्थ
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NDराष्ट्रीय मस्तिष्क अनुसंधान केन्द्र की साइंस मैग्जीन करंट साइंस में प्रकाशित एक रिसर्च का कहना है कि अँगरेजी पढ़ते समय दिमाग का सिर्फ बायाँ हैमिस्फैयर सक्रिय रहता है जबकि हिन्दी पढ़ते समय मस्तिष्क के दोनों हैमिस्फैयर सक्रिय हो जाते हैं। इससे दिमाग तरोताजा रहता है। ऐसा इसलिए होता है कि हिन्दी के शब्दों में ऊपर, नीचे और दाएँ-बाएँ लगी मात्राओं के कारण दिमाग को इसे पढ़ने में अधिक कसरत करनी पढ़ती है। दिमाग को तेज बनाने के लिए यूँ तो हिन्दी को पढ़ना भर काफी है। लेकिन इसका बेहतर इस्तेमाल करने के लिए पेश है कुछ टिप्स : हमेशा अपने पास 'हिन्दी टू हिन्दी डिक्शनरी' रखें। रोज एक अक्षर से शुरू होने वाले 10 शब्द पढ़ें और दिन भर में जब भी समय मिलें उन्हें दोहराएँ। जैसे अगर आप चुनते हैं 'स' तो स से शुरू सम्मान, संस्कृति, स्नेह, सुख, सौभाग्य, सरल, स्पष्ट, सटीक, संक्षिप्त और समान, जैसे शब्दों की लाइन तैयार कर सकते हैं। इस तरह आपकी वॉक्यूबलेरी भी बढ़ेगी और दिमाग भी एक्टिव रहेगा।
NDशुरूआत में आप सरल शब्दों का चयन करें। धीरे-धीरे कठिन शब्द याद करें। अपनी रूचि के अनुसार आप कोई कविता, कॉमिक्स, चुटकुले या फेवरेट हिन्दी साइट या पोर्टल लॉगिन कर सकते हैं। आप अपना खुद का ब्लॉग बनाकर मन में जो भी अच्छा और क्रिएटिव आए लिख दीजिए। इससे आपको तीन गुना फायदा होगा। आपका नॉलेज तो बढ़ेगा ही, भाषा ज्ञान भी समृद्ध होगा साथ ही आपको इंटरनेट की दुनिया में एक पहचान भी मिलेगी। आप बातचीत में हिन्दी के लोकप्रिय मुहावरे और कहावतों का प्रयोग करना शुरू कर दीजिए।
यूँ रहें स्वस्थ
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NDराष्ट्रीय मस्तिष्क अनुसंधान केन्द्र की साइंस मैग्जीन करंट साइंस में प्रकाशित एक रिसर्च का कहना है कि अँगरेजी पढ़ते समय दिमाग का सिर्फ बायाँ हैमिस्फैयर सक्रिय रहता है जबकि हिन्दी पढ़ते समय मस्तिष्क के दोनों हैमिस्फैयर सक्रिय हो जाते हैं। इससे दिमाग तरोताजा रहता है। ऐसा इसलिए होता है कि हिन्दी के शब्दों में ऊपर, नीचे और दाएँ-बाएँ लगी मात्राओं के कारण दिमाग को इसे पढ़ने में अधिक कसरत करनी पढ़ती है। दिमाग को तेज बनाने के लिए यूँ तो हिन्दी को पढ़ना भर काफी है। लेकिन इसका बेहतर इस्तेमाल करने के लिए पेश है कुछ टिप्स : हमेशा अपने पास 'हिन्दी टू हिन्दी डिक्शनरी' रखें। रोज एक अक्षर से शुरू होने वाले 10 शब्द पढ़ें और दिन भर में जब भी समय मिलें उन्हें दोहराएँ। जैसे अगर आप चुनते हैं 'स' तो स से शुरू सम्मान, संस्कृति, स्नेह, सुख, सौभाग्य, सरल, स्पष्ट, सटीक, संक्षिप्त और समान, जैसे शब्दों की लाइन तैयार कर सकते हैं। इस तरह आपकी वॉक्यूबलेरी भी बढ़ेगी और दिमाग भी एक्टिव रहेगा।
NDशुरूआत में आप सरल शब्दों का चयन करें। धीरे-धीरे कठिन शब्द याद करें। अपनी रूचि के अनुसार आप कोई कविता, कॉमिक्स, चुटकुले या फेवरेट हिन्दी साइट या पोर्टल लॉगिन कर सकते हैं। आप अपना खुद का ब्लॉग बनाकर मन में जो भी अच्छा और क्रिएटिव आए लिख दीजिए। इससे आपको तीन गुना फायदा होगा। आपका नॉलेज तो बढ़ेगा ही, भाषा ज्ञान भी समृद्ध होगा साथ ही आपको इंटरनेट की दुनिया में एक पहचान भी मिलेगी। आप बातचीत में हिन्दी के लोकप्रिय मुहावरे और कहावतों का प्रयोग करना शुरू कर दीजिए।
'पप्पू कांट स्टडी क्योंकि...
जीवन के रंगमंच से
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NDपप्पू, नौ साल का एक बालक, कक्षा पाँच में पढ़ता है। उसकी माँ को हमेशा शिकायत रहती है कि पप्पू पढ़ता नहीं है। वह इतना होनहार है कि चाहे तो कुछ भी कर डाले, मगर वह मेहनत नहीं करना चाहता।आइए अब जरा नन्हे पप्पू की दिनचर्या पर नजर डालें। पप्पू का दिन शुरू होता है सुबह साढ़े पाँच बजे, जब उसकी माँ की तेज आवाज उसे सुहाने सपनों भरी नींद से जगाती है। उठने के बाद आलस करने या माँ से लिपटने-चिपटने, लाड़-मनुहार का भी समय नहीं क्योंकि ठीक साढ़े छह बजे पप्पू की बस आ जाती है। (अच्छे स्कूल के लालच में पप्पू का दाखिला घर से पंद्रह किलोमीटर दूर के स्कूल में कराया गया है) भागमभाग में तैयार हो पप्पू स्कूल जाता है। स्कूल छूटता है तीन बजे और वही दूरी के चक्कर में पप्पू घर पहुँचता है साढ़े चार बजे।
NDघर में माँ तैयार है नाश्ता और अन्य साजोसामान लिए... सवा पाँच बजे पप्पू की कराटे क्लास जो होती है। एक घंटे की कराटे क्लास के बाद पप्पू टेबल टेनिस क्लास में जाता है। साढ़े सात बजे बेचारा थका-हारा वापस आता है। खाना जैसे-तैसे खाया कि आठ से नौ ट्यूशन टीचर आती है। स्कूल का होमवर्क अनमने मन से किया जाता है। साढ़े नौ बजे तक तो पप्पू अधमरा सा बिस्तर पर लुढ़क चुका होता है।रविवार आमतौर पर सभी के लिए राहत भरा होता है। मगर क्या पप्पू के लिए भी?... रविवार की सुबह-सुबह पप्पू की स्वीमिंग क्लास होती है। डेढ़ घंटे की स्वीमिंग के बाद पप्पू नाश्ता करके (बाजार में ही) व्यक्तित्व विकास की कक्षा में जाता है। दो घंटे की कक्षा में उसे संस्कार, सोसायटी में उठना-बैठना, बोलने का तरीका, स्मार्टनेस सब कुछ परोस दिया जाता है। ठीक साढ़े नौ बजे पप्पू संगीत और गिटार सीखने जाता है।ग्यारह बजे घर लौटने के बाद वह सचमुच थक चुका होता है। जैसे-तैसे लंच करके सो जाता है। शाम को चार से छह ही उसकी ट्यूशन टीचर आती है। फिर छह से सात स्केटिंग क्लास और पप्पू का रविवार भी समाप्त....। पप्पू की माँ हैरान होती है कि पप्पू न तो टीवी देखता है, न कंप्यूटर चलाता है, न खेलता है। फिर भी पप्पू ध्यान से पढ़ता क्यों नहीं है? कक्षा में उसका परफार्मेंस दिन प्रतिदिन नीचे क्यों जा रहा है?
NDये सब पढ़कर कहीं आपको भी अपने आसपास का कोई पप्पू तो याद नहीं आ गया? हैरानी होती है कि जो बच्चा माँ-बाप के जिगर का टुकड़ा बनता है, वही बड़ा होते-होते किस तरह स्वयं को माँ-बाप के अधूरे सपनों की सूली पर लटकने को मजबूर किया हुआ पाता है। क्या ही अच्छा होता आज भी पहले की तरह हर घर में चार-पाँच बच्चे होते। एक बच्चा माँ के सपनों का भार ढोता, दूसरा पिता के, तीसरा दादा के, चौथा नाना के। बेचारी एक नन्ही जान पर दुनिया भर का बोझा लादना कहाँ का इंसाफ है?माना कि दुनिया बहुत आगे जा रही है, माना कि प्रतियोगिता बढ़ती जा रही है, माना कि विकास के मायने बदल रहे हैं... मगर क्या इसके लिए जीते जागते इंसान की संवेदनाएँ छीन उसे मशीनी मानव बनाना जरूरी है? क्या 'ऑल राउंडर्स' के बिना दुनिया चलती नहीं है? क्या आपका बच्चा दुनिया भर की सफलताएँ बटोरने की बजाय अपनी क्षमतानुसार किसी क्षेत्र में सफल हो, एक अच्छा इंसान बनने का प्रयास करें, यह ठीक न होगा? बचपन, जो समय होता है रिश्तों की मजबूती का, पारिवारिक संस्कारों को दृढ़ करने का, प्रेम के धागों को परिपक्व बनाने का...। यदि वही बचपन प्रतियोगिताओं की भेंट चढ़ा दिया जाए, यदि बच्चे को परिवार में घुलने-मिलने, रूठने-मनाने, मिलने-मिलाने का समय ही न दिया जाए, उसे अपना बचपना महसूस ही न करने दिया जाए तो वह बच्चा न केवल एकाकी बन जाएगा वरन् किसी भी क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाएगा और हार का यह कटु अहसास उसे मानसिक रोगी भी बना सकता है।
NDहर माता-पिता मन में यह अपेक्षा रखकर ही बच्चे को पालते-पोसते हैं कि वह बड़ा होकर हमारा ध्यान रखेगा, हमारी सेवा करेगा मगर क्या प्रेम, स्नेह व आदर का बीज वे बच्चे के बाल-मन में बो पाए हैं? क्या उसकी मानसिक आवश्यकताओं की पूर्ति वे कर पा रहे हैं? क्या उसे परिवार का पूर्ण साहचर्य व स्नेह प्राप्त हो रहा है? क्या उसके साथ मुखर संवाद बनाया जा रहा है? क्या उसकी क्षमताओं व परेशानियों को समझा जा रहा है?क्या उसे भी 'नहीं' कहने और गलतियाँ करने की छूट दी जा रही है? क्या उसके माता-पिता उसके समक्ष आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं।यदि इनमें से कुछ प्रश्नों के उत्तर भी यदि 'नहीं' हैं तो यकीन मानिए आप की अपेक्षाओं का पूरा होना कठिन है क्योंकि आप रुपयों के बल पर एक बच्चे को संवेदनहीन मशीनी मानव में बदलते जा रहे हैं। मशीनी मानव सिर्फ उपलब्ध सूचनाओं पर काम करता है। उसके पास संवेदनाएँ नहीं होतीं, दुख दर्द महसूस करने वाला दिल, वो तो होता ही नहीं है, उसे चलाने वाली सूचनाएँ भी नहीं होती। अब आप क्या चाहते हैं अपने पप्पू के लिए... ये आप पर निर्भर करता
जीवन के रंगमंच से
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NDपप्पू, नौ साल का एक बालक, कक्षा पाँच में पढ़ता है। उसकी माँ को हमेशा शिकायत रहती है कि पप्पू पढ़ता नहीं है। वह इतना होनहार है कि चाहे तो कुछ भी कर डाले, मगर वह मेहनत नहीं करना चाहता।आइए अब जरा नन्हे पप्पू की दिनचर्या पर नजर डालें। पप्पू का दिन शुरू होता है सुबह साढ़े पाँच बजे, जब उसकी माँ की तेज आवाज उसे सुहाने सपनों भरी नींद से जगाती है। उठने के बाद आलस करने या माँ से लिपटने-चिपटने, लाड़-मनुहार का भी समय नहीं क्योंकि ठीक साढ़े छह बजे पप्पू की बस आ जाती है। (अच्छे स्कूल के लालच में पप्पू का दाखिला घर से पंद्रह किलोमीटर दूर के स्कूल में कराया गया है) भागमभाग में तैयार हो पप्पू स्कूल जाता है। स्कूल छूटता है तीन बजे और वही दूरी के चक्कर में पप्पू घर पहुँचता है साढ़े चार बजे।
NDघर में माँ तैयार है नाश्ता और अन्य साजोसामान लिए... सवा पाँच बजे पप्पू की कराटे क्लास जो होती है। एक घंटे की कराटे क्लास के बाद पप्पू टेबल टेनिस क्लास में जाता है। साढ़े सात बजे बेचारा थका-हारा वापस आता है। खाना जैसे-तैसे खाया कि आठ से नौ ट्यूशन टीचर आती है। स्कूल का होमवर्क अनमने मन से किया जाता है। साढ़े नौ बजे तक तो पप्पू अधमरा सा बिस्तर पर लुढ़क चुका होता है।रविवार आमतौर पर सभी के लिए राहत भरा होता है। मगर क्या पप्पू के लिए भी?... रविवार की सुबह-सुबह पप्पू की स्वीमिंग क्लास होती है। डेढ़ घंटे की स्वीमिंग के बाद पप्पू नाश्ता करके (बाजार में ही) व्यक्तित्व विकास की कक्षा में जाता है। दो घंटे की कक्षा में उसे संस्कार, सोसायटी में उठना-बैठना, बोलने का तरीका, स्मार्टनेस सब कुछ परोस दिया जाता है। ठीक साढ़े नौ बजे पप्पू संगीत और गिटार सीखने जाता है।ग्यारह बजे घर लौटने के बाद वह सचमुच थक चुका होता है। जैसे-तैसे लंच करके सो जाता है। शाम को चार से छह ही उसकी ट्यूशन टीचर आती है। फिर छह से सात स्केटिंग क्लास और पप्पू का रविवार भी समाप्त....। पप्पू की माँ हैरान होती है कि पप्पू न तो टीवी देखता है, न कंप्यूटर चलाता है, न खेलता है। फिर भी पप्पू ध्यान से पढ़ता क्यों नहीं है? कक्षा में उसका परफार्मेंस दिन प्रतिदिन नीचे क्यों जा रहा है?
NDये सब पढ़कर कहीं आपको भी अपने आसपास का कोई पप्पू तो याद नहीं आ गया? हैरानी होती है कि जो बच्चा माँ-बाप के जिगर का टुकड़ा बनता है, वही बड़ा होते-होते किस तरह स्वयं को माँ-बाप के अधूरे सपनों की सूली पर लटकने को मजबूर किया हुआ पाता है। क्या ही अच्छा होता आज भी पहले की तरह हर घर में चार-पाँच बच्चे होते। एक बच्चा माँ के सपनों का भार ढोता, दूसरा पिता के, तीसरा दादा के, चौथा नाना के। बेचारी एक नन्ही जान पर दुनिया भर का बोझा लादना कहाँ का इंसाफ है?माना कि दुनिया बहुत आगे जा रही है, माना कि प्रतियोगिता बढ़ती जा रही है, माना कि विकास के मायने बदल रहे हैं... मगर क्या इसके लिए जीते जागते इंसान की संवेदनाएँ छीन उसे मशीनी मानव बनाना जरूरी है? क्या 'ऑल राउंडर्स' के बिना दुनिया चलती नहीं है? क्या आपका बच्चा दुनिया भर की सफलताएँ बटोरने की बजाय अपनी क्षमतानुसार किसी क्षेत्र में सफल हो, एक अच्छा इंसान बनने का प्रयास करें, यह ठीक न होगा? बचपन, जो समय होता है रिश्तों की मजबूती का, पारिवारिक संस्कारों को दृढ़ करने का, प्रेम के धागों को परिपक्व बनाने का...। यदि वही बचपन प्रतियोगिताओं की भेंट चढ़ा दिया जाए, यदि बच्चे को परिवार में घुलने-मिलने, रूठने-मनाने, मिलने-मिलाने का समय ही न दिया जाए, उसे अपना बचपना महसूस ही न करने दिया जाए तो वह बच्चा न केवल एकाकी बन जाएगा वरन् किसी भी क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाएगा और हार का यह कटु अहसास उसे मानसिक रोगी भी बना सकता है।
NDहर माता-पिता मन में यह अपेक्षा रखकर ही बच्चे को पालते-पोसते हैं कि वह बड़ा होकर हमारा ध्यान रखेगा, हमारी सेवा करेगा मगर क्या प्रेम, स्नेह व आदर का बीज वे बच्चे के बाल-मन में बो पाए हैं? क्या उसकी मानसिक आवश्यकताओं की पूर्ति वे कर पा रहे हैं? क्या उसे परिवार का पूर्ण साहचर्य व स्नेह प्राप्त हो रहा है? क्या उसके साथ मुखर संवाद बनाया जा रहा है? क्या उसकी क्षमताओं व परेशानियों को समझा जा रहा है?क्या उसे भी 'नहीं' कहने और गलतियाँ करने की छूट दी जा रही है? क्या उसके माता-पिता उसके समक्ष आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं।यदि इनमें से कुछ प्रश्नों के उत्तर भी यदि 'नहीं' हैं तो यकीन मानिए आप की अपेक्षाओं का पूरा होना कठिन है क्योंकि आप रुपयों के बल पर एक बच्चे को संवेदनहीन मशीनी मानव में बदलते जा रहे हैं। मशीनी मानव सिर्फ उपलब्ध सूचनाओं पर काम करता है। उसके पास संवेदनाएँ नहीं होतीं, दुख दर्द महसूस करने वाला दिल, वो तो होता ही नहीं है, उसे चलाने वाली सूचनाएँ भी नहीं होती। अब आप क्या चाहते हैं अपने पप्पू के लिए... ये आप पर निर्भर करता
एक्जाम सक्सेस
कैसे पाएँ एक्जाम में सक्सेस
एक्जाम के लिए हेल्थ टिप्स
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NDसालाना एक्जाम नजदीक आ रही हैं और देशभर के स्टूडेंट्स अपनी-अपनी तैयारी में व्यस्त हैं। एक्जाम में अपने परफॉर्मेंस को लेकर उनकी चिंताओं का कोई अंत नहीं है। चिंता, टेंशन, फिक्र और घबराहट सेहत के लिए हानिकारक होती है। इससे डिप्रेशन व थकान जैसे लक्षण शुरू हो जाते हैं। चिंता के नुकसान लोगों को मालूम हैं, लेकिन फिर भी इन्हें अनदेखा किया जाता है। तनाव से छुटकारा पाना जरूरी है, क्योंकि इससे न सिर्फ डिप्रेशन दूर होता है, बल्कि फीजिकली भी राहत मिलती है। वास्तव में बॉडी और माइंड का सही बैलेंस ही किसी छात्र को कठिन समय से बाहर आने में मदद करता है। इसलिए यह तो तय है कि इनमें से किसी एक पर सारा जोर डालकर परीक्षा के चैलेंज से पार नहीं पाया जा सकता। यदि किसी भी गोल को बेस्ट रिजल्ट के साथ हासिल करना है तो तन और मन सही रिदम में होने चाहिए। बॉडी और माइंड का सही बैलेंस होने से गोल अचीव करने में सहायता मिलती है। अपने आपको सही दिशा में फोकस करने में मदद मिलती है। इसलिए बहुत जरूरी है कि हम अपने प्रयास इस दिशा में आगे बढ़ाएँ ताकि विद्यार्थियों को अपनी एकेडेमिक अपेक्षा के मुताबिक परफॉर्म करने में मदद मिल सके। यह सिर्फ बॉडी और माइंड के तालमेल से ही मुमकिन हो सकता है। चूँकि फरवरी-मार्च में परीक्षाएँ होंगी, इसलिए इस दौरान खास तवज्जो देने की जरूरत है, क्योंकि इन दिनों तापमान में उतार-चढ़ाव होने के चलते इन्फेक्शन होने का अधिक जोखिम रहता है।रिलेशन बिटविन टेंशन एंड मेमोरी
NDस्टडी व मेमोरी के लिए टेंशन जरूरी भी है, लेकिन बहुत ज्यादा चिंता और फेल होने के डर से सोचने की क्षमता पर बुरा असर पड़ता है जिससे ऐन परीक्षाओं के वक्त मेमोरी ब्लॉक हो सकती है। एनर्जी के लेवल में गिरावट व कॉन्सन्ट्रैशन में कमी हो सकती है। टेंशन बढ़ने से रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी रेसिस्टेंट पॉवर कम होने लगती है और शरीर अस्वस्थ होगा तो जाहिर-सी बात है कि दिमाग पर प्रैशर भी बढ़ेगा। कई घंटों तक लगातार बैठे रहकर पढ़ने से कोई फायदा नहीं होता, क्योंकि एक टाइम लिमिट के बाद टेंशन का लेवल बढ़ता जाता है और एकाग्रता का स्तर गिरने लगता है। माइंड में कुछ भी रजिस्टर नहीं होता, इसीलिए इस दौरान न तो कुछ पढ़ा हुआ याद रह पाता है और न ही कोई विचार दिमाग में अपनी जगह बना पाता है। एक्सरसाइज जरूरी है मात्र 10 मिनट की पैदल सैर भी आपको शांत करके ज्यादा एकाग्र बना सकती है। इससे शरीर में ब्लड सर्कूलेशन बेहतर होता है।
एक्जाम के लिए हेल्थ टिप्स
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NDसालाना एक्जाम नजदीक आ रही हैं और देशभर के स्टूडेंट्स अपनी-अपनी तैयारी में व्यस्त हैं। एक्जाम में अपने परफॉर्मेंस को लेकर उनकी चिंताओं का कोई अंत नहीं है। चिंता, टेंशन, फिक्र और घबराहट सेहत के लिए हानिकारक होती है। इससे डिप्रेशन व थकान जैसे लक्षण शुरू हो जाते हैं। चिंता के नुकसान लोगों को मालूम हैं, लेकिन फिर भी इन्हें अनदेखा किया जाता है। तनाव से छुटकारा पाना जरूरी है, क्योंकि इससे न सिर्फ डिप्रेशन दूर होता है, बल्कि फीजिकली भी राहत मिलती है। वास्तव में बॉडी और माइंड का सही बैलेंस ही किसी छात्र को कठिन समय से बाहर आने में मदद करता है। इसलिए यह तो तय है कि इनमें से किसी एक पर सारा जोर डालकर परीक्षा के चैलेंज से पार नहीं पाया जा सकता। यदि किसी भी गोल को बेस्ट रिजल्ट के साथ हासिल करना है तो तन और मन सही रिदम में होने चाहिए। बॉडी और माइंड का सही बैलेंस होने से गोल अचीव करने में सहायता मिलती है। अपने आपको सही दिशा में फोकस करने में मदद मिलती है। इसलिए बहुत जरूरी है कि हम अपने प्रयास इस दिशा में आगे बढ़ाएँ ताकि विद्यार्थियों को अपनी एकेडेमिक अपेक्षा के मुताबिक परफॉर्म करने में मदद मिल सके। यह सिर्फ बॉडी और माइंड के तालमेल से ही मुमकिन हो सकता है। चूँकि फरवरी-मार्च में परीक्षाएँ होंगी, इसलिए इस दौरान खास तवज्जो देने की जरूरत है, क्योंकि इन दिनों तापमान में उतार-चढ़ाव होने के चलते इन्फेक्शन होने का अधिक जोखिम रहता है।रिलेशन बिटविन टेंशन एंड मेमोरी
NDस्टडी व मेमोरी के लिए टेंशन जरूरी भी है, लेकिन बहुत ज्यादा चिंता और फेल होने के डर से सोचने की क्षमता पर बुरा असर पड़ता है जिससे ऐन परीक्षाओं के वक्त मेमोरी ब्लॉक हो सकती है। एनर्जी के लेवल में गिरावट व कॉन्सन्ट्रैशन में कमी हो सकती है। टेंशन बढ़ने से रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी रेसिस्टेंट पॉवर कम होने लगती है और शरीर अस्वस्थ होगा तो जाहिर-सी बात है कि दिमाग पर प्रैशर भी बढ़ेगा। कई घंटों तक लगातार बैठे रहकर पढ़ने से कोई फायदा नहीं होता, क्योंकि एक टाइम लिमिट के बाद टेंशन का लेवल बढ़ता जाता है और एकाग्रता का स्तर गिरने लगता है। माइंड में कुछ भी रजिस्टर नहीं होता, इसीलिए इस दौरान न तो कुछ पढ़ा हुआ याद रह पाता है और न ही कोई विचार दिमाग में अपनी जगह बना पाता है। एक्सरसाइज जरूरी है मात्र 10 मिनट की पैदल सैर भी आपको शांत करके ज्यादा एकाग्र बना सकती है। इससे शरीर में ब्लड सर्कूलेशन बेहतर होता है।
आपकी लाइफ का फंडा क्या है?
हेल्थ और ब्यूटी आपके हाथ में
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NDएक बिंदास और स्मार्ट युवा लाइफ का यही फंडा है- खाओ, पियो और मौज करों। लेकिन जब इसी उम्र में चर्बी चढ़ने लगती है, जब इसी उम्र में सेक्सुअल डीसिज के आँकड़ें बढ़ने लगते हैं और जब इसी उम्र में टेंशन के मारे युवा नशे के शिकार होने लगते हैं तो चिंता स्वाभाविक है। ऐसा नहीं है कि यह उम्र लापरवाह होती है। अगर ऐसा होता तो सिक्स पैक एब और जीरो फिगर की चाह में हमारा युवा जिम में मशक्कत नहीं कर रहा होता। सभी युवाओं की इच्छा होती है वह सुंदर दिखे, सेहतमंद रहे लेकिन साथ ही उत्साह, जोश और मस्ती भी तो इसी एज का असर है। वह कहाँ-कहाँ से बचें और कितना बचें। उम्र की सारी खुशियाँ बटोरते हुए भी हेल्थ और ब्यूटी पाई जा सकती है। पेश है सरल और सही उपाय आपके लिए। लाइफ को समझें इस उम्र में पेरेंट्स का रोकना-टोकना बुरा लगता है। लेकिन थोड़ा-सा समझें कि वे इस उम्र से गुजर चुके हैं। उन्हें हमसे ज्यादा अनुभव है। ठीक है, उनका जमाना और था, हमारा जमाना अलग है। पर सेहत की बात तो हर समय उतनी ही सही और सटीक होती है, जितनी हमारे शरीर लिए जरूरी है। हमें उनका कहा बुरा लगता है तो खुद सोचें कि क्या हम यूँ ही इस दुनिया से चले जाएँगे बिना अपने सपनों को साकार किए? नहीं ना? तो फिर सुबह जल्दी उठना, मॉर्निंग वॉक पर जाना, जिम जाना या जंक फूड ना खाना जैसी बातें हमें बुरी क्यों लगती है? अगर हमें सपने पूरे करने हैं तो लंबे समय तक जीना होगा और जीने के लिए हेल्दी रहना होगा और हेल्दी रहने के लिए बस इन्हीं छोटी-छोटी बातों का पालन करना होगा। समझ गए ना? तो जियो जी भर के मगर सही तरीके से। अगर आपको पेरेंट्स की रोक-टोक पसंद नहीं तो अपने नियम खुद बना लें आखिर सेहत भी तो आपकी है। अपने मन के राजा यंगएज में हर बात पर उतावलापन, गुस्सा, तनाव, जोश, सब इसके शिकार होते हैं। लेकिन हमें यह तय करना है कि हमें इतना गुस्सा क्यों आता है, किस बात पर आता है और किस पर सबसे ज्यादा आता है? जब इनके जवाब खोज लें तो फिर यह तय करें कि आपके मन पर कौन राज करता है? इसे कुछ यूँ समझें कि अगर कोई व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति आपको गुस्सा दिला रही है तो इसका मतलब है अपने मन पर आपने किसी और को शासन करने की परमिशन दे रखी है। वो जब चाहे आपको गुस्सा दिला देता है। इन शॉर्ट किस बात पर कितना गुस्सा करना है यह कोई और नहीं बल्कि आप खुद तय करें। अपने मन के राजा आप खुद बनें। इससे कम से कम दस बीमारियों से आप दूर रहेंगे। ऐसा मेडिकल साईंस कहता है। तीन बातों का समय निश्चित करें खाना,नहाना और सोना अगर जीवन में सिर्फ इन तीन बातों का भी आपने समय डिसाइड कर लिया तो समझों आपकी आधी लाइफ सुधर गई। समय पर खाने से शरीर का मेटॉबॉलिज्म सुधरता है। समय पर नहाने से शरीर का एक सही चक्र बनता है। जो सारे दिन फ्रेशनेस देता है। समय पर सोने से ब्रेन एक्टिव और हेल्दी रहता है। ब्रेन को पर्याप्त आराम मिलेगा तो आपकी डिसीजन मैकिंग पॉवर स्ट्रॉंग होगी। अच्छी नींद, अच्छा खाना और अच्छे से नहाना ये बस सेहत के लिए ही नहीं सुंदरता के लिए भी जरुरी है।
NDगलती करों लेकिन बस एक बार इस दुनिया में ऐसा कोई नहीं जिससे गलतियाँ नहीं होती। लेकिन एक ही गलती को बार-बार करना गलत है। और इससे भी ज्यादा गलत है एक गलती को उम्र भर के लिए अपराध मान लेना। हर समय पश्चाताप की आग में जलना सही नहीं है। जिस दिन आपको यह एहसास हो कि आप गलत थे बस वही दिन आपका नया दिन है। पुरानी सब बातों, गलतियों और भूलों के लिए खुद को माफ करों। कहते हैं, जो एक बार गिरता है वह संभल कर चलना सीख जाता है। इसलिए सब बातों पर धूल-मिट्टी डालों और आगे बढ़ जाओं। दुनिया आपको आपकी गलतियों के लिए माफ करें ना करें। आप खुद को माफ करें और जरुरत पड़ने पर खुद को ही सजा भी दें। लेकिन खुद पर दया ना करें ना ही खुद पर अत्याचार करें। यह दोनों बातें ही हेल्थ को नुकसान पहुँचाती है। सो, बी केयरफूल, हेल्थ इज वेल्थ।
हेल्थ और ब्यूटी आपके हाथ में
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NDएक बिंदास और स्मार्ट युवा लाइफ का यही फंडा है- खाओ, पियो और मौज करों। लेकिन जब इसी उम्र में चर्बी चढ़ने लगती है, जब इसी उम्र में सेक्सुअल डीसिज के आँकड़ें बढ़ने लगते हैं और जब इसी उम्र में टेंशन के मारे युवा नशे के शिकार होने लगते हैं तो चिंता स्वाभाविक है। ऐसा नहीं है कि यह उम्र लापरवाह होती है। अगर ऐसा होता तो सिक्स पैक एब और जीरो फिगर की चाह में हमारा युवा जिम में मशक्कत नहीं कर रहा होता। सभी युवाओं की इच्छा होती है वह सुंदर दिखे, सेहतमंद रहे लेकिन साथ ही उत्साह, जोश और मस्ती भी तो इसी एज का असर है। वह कहाँ-कहाँ से बचें और कितना बचें। उम्र की सारी खुशियाँ बटोरते हुए भी हेल्थ और ब्यूटी पाई जा सकती है। पेश है सरल और सही उपाय आपके लिए। लाइफ को समझें इस उम्र में पेरेंट्स का रोकना-टोकना बुरा लगता है। लेकिन थोड़ा-सा समझें कि वे इस उम्र से गुजर चुके हैं। उन्हें हमसे ज्यादा अनुभव है। ठीक है, उनका जमाना और था, हमारा जमाना अलग है। पर सेहत की बात तो हर समय उतनी ही सही और सटीक होती है, जितनी हमारे शरीर लिए जरूरी है। हमें उनका कहा बुरा लगता है तो खुद सोचें कि क्या हम यूँ ही इस दुनिया से चले जाएँगे बिना अपने सपनों को साकार किए? नहीं ना? तो फिर सुबह जल्दी उठना, मॉर्निंग वॉक पर जाना, जिम जाना या जंक फूड ना खाना जैसी बातें हमें बुरी क्यों लगती है? अगर हमें सपने पूरे करने हैं तो लंबे समय तक जीना होगा और जीने के लिए हेल्दी रहना होगा और हेल्दी रहने के लिए बस इन्हीं छोटी-छोटी बातों का पालन करना होगा। समझ गए ना? तो जियो जी भर के मगर सही तरीके से। अगर आपको पेरेंट्स की रोक-टोक पसंद नहीं तो अपने नियम खुद बना लें आखिर सेहत भी तो आपकी है। अपने मन के राजा यंगएज में हर बात पर उतावलापन, गुस्सा, तनाव, जोश, सब इसके शिकार होते हैं। लेकिन हमें यह तय करना है कि हमें इतना गुस्सा क्यों आता है, किस बात पर आता है और किस पर सबसे ज्यादा आता है? जब इनके जवाब खोज लें तो फिर यह तय करें कि आपके मन पर कौन राज करता है? इसे कुछ यूँ समझें कि अगर कोई व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति आपको गुस्सा दिला रही है तो इसका मतलब है अपने मन पर आपने किसी और को शासन करने की परमिशन दे रखी है। वो जब चाहे आपको गुस्सा दिला देता है। इन शॉर्ट किस बात पर कितना गुस्सा करना है यह कोई और नहीं बल्कि आप खुद तय करें। अपने मन के राजा आप खुद बनें। इससे कम से कम दस बीमारियों से आप दूर रहेंगे। ऐसा मेडिकल साईंस कहता है। तीन बातों का समय निश्चित करें खाना,नहाना और सोना अगर जीवन में सिर्फ इन तीन बातों का भी आपने समय डिसाइड कर लिया तो समझों आपकी आधी लाइफ सुधर गई। समय पर खाने से शरीर का मेटॉबॉलिज्म सुधरता है। समय पर नहाने से शरीर का एक सही चक्र बनता है। जो सारे दिन फ्रेशनेस देता है। समय पर सोने से ब्रेन एक्टिव और हेल्दी रहता है। ब्रेन को पर्याप्त आराम मिलेगा तो आपकी डिसीजन मैकिंग पॉवर स्ट्रॉंग होगी। अच्छी नींद, अच्छा खाना और अच्छे से नहाना ये बस सेहत के लिए ही नहीं सुंदरता के लिए भी जरुरी है।
NDगलती करों लेकिन बस एक बार इस दुनिया में ऐसा कोई नहीं जिससे गलतियाँ नहीं होती। लेकिन एक ही गलती को बार-बार करना गलत है। और इससे भी ज्यादा गलत है एक गलती को उम्र भर के लिए अपराध मान लेना। हर समय पश्चाताप की आग में जलना सही नहीं है। जिस दिन आपको यह एहसास हो कि आप गलत थे बस वही दिन आपका नया दिन है। पुरानी सब बातों, गलतियों और भूलों के लिए खुद को माफ करों। कहते हैं, जो एक बार गिरता है वह संभल कर चलना सीख जाता है। इसलिए सब बातों पर धूल-मिट्टी डालों और आगे बढ़ जाओं। दुनिया आपको आपकी गलतियों के लिए माफ करें ना करें। आप खुद को माफ करें और जरुरत पड़ने पर खुद को ही सजा भी दें। लेकिन खुद पर दया ना करें ना ही खुद पर अत्याचार करें। यह दोनों बातें ही हेल्थ को नुकसान पहुँचाती है। सो, बी केयरफूल, हेल्थ इज वेल्थ।
कहानी
बीमार माँ
लघुकथा
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NDएक धनी व्यक्ति की माँ अक्सर बीमार रहती थी। माँ रोज बेटे-बहू को कहती थी कि बेटा, मुझे डॉक्टर के पास ले चल। बेटा भी रोज पत्नी को कह देता, माँ को ले जाना, मैं तो फैक्टरी के काम में व्यस्त रहता हूँ। क्या तुम माँ का चेकअप नहीं करा सकती हो? पत्नी भी लापरवाही से उत्तर दे देती, पिछले साल गई तो थी, डॉक्टर ने कोई ऑपरेशन का कहा है। जब तकलीफ होगी ले जाना और वह अपने काम में लग जाती। बेटा भी ब्रीफकेस उठाकर चलता हुआ बोल जाता कि माँ तुम भी थोड़ी सहनशक्ति रखा करो।फैक्टरी की पार्किंग में उस व्यक्ति को हमेशा एक निर्धन लड़का मिलता था। वह पार्किंग के पास ही बूट पॉलिश करता रहता। और जब कभी बूट पॉलिश का काम नहीं होता, तब वह वहाँ रखी गाड़ियों को कपड़े से साफ करता। गाड़ी वाले उसे जो भी 2-4 रुपए देते उसे ले लेता। धनी व्यक्ति और अन्य दूसरे लोग भी रोज मिलने से उसे पहचानने लग गए थे। लड़का भी जिस साहब से 5 रुपए मिलते उस साहब को लंबा सलाम ठोकता था।एक दिन की बात है धनी व्यक्ति शाम को मीटिंग लेकर अपने कैबिन में आकर बैठा। उसको एक जरूरी फोन पर जानकारी मिली, जो उसके घर से था। घर का नंबर मिलाया तो नौकर ने कहा 'साहब आपको 11 बजे से फोन कर रहे हैं। माताजी की तबीयत बहुत खराब हो गई थी, इसलिए बहादुर और रामू दोनों नौकर उन्हें सरकारी अस्पताल ले गए हैं।' धनी व्यक्ति फोन पर दहाड़ा, 'क्या मेम साहब घर पर नहीं हैं?' वह डरकर बोला, 'वे तो सुबह 10 बजे ही आपके जाने के बाद चली गईं। साहब घर पर कोई नहीं था और हमें कुछ समझ में नहीं आया। माताजी ने ही हमें मुश्किल से कहा, 'बेटा मुझे सरकारी अस्पताल ले चलो, तो माली और बहादुर दोनों रिक्शा में ले गए और साहब मैं मेम साहब का रास्ता देखने के लिए और आपको फोन करने के लिए घर पर रुक गया।'धनी व्यक्ति ने गुस्से एवं भारीपन से फोन रखा और लगभग दौड़ते हुए गाड़ी निकालकर तेज गति से सरकारी अस्पताल की ओर निकल पड़ा। जैसे ही रिसेप्शन की ओर बढ़ा, उसने सोचा कि यहीं से जानकारी ले लेता हूँ। 'सलाम साहब' एकाएक धनी व्यक्ति चौंका, उसे यहाँ कौन सलाम कर रहा है?
ND'अरे तुम वही गरीब लड़के हो?' और उसका हाथ पकड़े उसकी बूढ़ी माँ थी। धनी व्यक्ति ने आश्चर्य से पूछा, 'अरे तुम यहाँ, क्या बात है?' लड़का बोला, 'साहब, मेरी माँ बीमार थी। 15 दिनों से यहीं भर्ती थी। इसीलिए पैसे इकट्ठे करता था।' और ऊपर हाथ करके बोला, 'भगवान आप जैसे लोगों का भला करे जिनके आशीर्वाद से मेरी माँ ठीक हो गई। आज ही छुट्टी मिली है। घर जा रहा हूँ। मगर साहब आप यहाँ कैसे?' धनी व्यक्ति जैसे नींद से जागा हो। 'हाँ' कहकर वह रिसेप्शन की ओर बढ़ गया। वहाँ से जानकारी लेकर लंबे-लंबे कदम से आगे बढ़ता गया। सामने से उसे दो डॉक्टर आते मिले। उसने अपना परिचय दिया और माँ के बारे में पूछा।'ओ आई एम सॉरी, शी इज नो मोर, आपने बहुत देर कर दी' कहते हुए डॉक्टर आगे निकल गए। वह हारा-सा सिर पकड़ कर वहीं बेंच पर बैठ गया। सामने गरीब लड़का चला जा रहा था और उसके कंधे पर हाथ रखे धीरे-धीरे उसकी माँ जा रही थी।
लघुकथा
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NDएक धनी व्यक्ति की माँ अक्सर बीमार रहती थी। माँ रोज बेटे-बहू को कहती थी कि बेटा, मुझे डॉक्टर के पास ले चल। बेटा भी रोज पत्नी को कह देता, माँ को ले जाना, मैं तो फैक्टरी के काम में व्यस्त रहता हूँ। क्या तुम माँ का चेकअप नहीं करा सकती हो? पत्नी भी लापरवाही से उत्तर दे देती, पिछले साल गई तो थी, डॉक्टर ने कोई ऑपरेशन का कहा है। जब तकलीफ होगी ले जाना और वह अपने काम में लग जाती। बेटा भी ब्रीफकेस उठाकर चलता हुआ बोल जाता कि माँ तुम भी थोड़ी सहनशक्ति रखा करो।फैक्टरी की पार्किंग में उस व्यक्ति को हमेशा एक निर्धन लड़का मिलता था। वह पार्किंग के पास ही बूट पॉलिश करता रहता। और जब कभी बूट पॉलिश का काम नहीं होता, तब वह वहाँ रखी गाड़ियों को कपड़े से साफ करता। गाड़ी वाले उसे जो भी 2-4 रुपए देते उसे ले लेता। धनी व्यक्ति और अन्य दूसरे लोग भी रोज मिलने से उसे पहचानने लग गए थे। लड़का भी जिस साहब से 5 रुपए मिलते उस साहब को लंबा सलाम ठोकता था।एक दिन की बात है धनी व्यक्ति शाम को मीटिंग लेकर अपने कैबिन में आकर बैठा। उसको एक जरूरी फोन पर जानकारी मिली, जो उसके घर से था। घर का नंबर मिलाया तो नौकर ने कहा 'साहब आपको 11 बजे से फोन कर रहे हैं। माताजी की तबीयत बहुत खराब हो गई थी, इसलिए बहादुर और रामू दोनों नौकर उन्हें सरकारी अस्पताल ले गए हैं।' धनी व्यक्ति फोन पर दहाड़ा, 'क्या मेम साहब घर पर नहीं हैं?' वह डरकर बोला, 'वे तो सुबह 10 बजे ही आपके जाने के बाद चली गईं। साहब घर पर कोई नहीं था और हमें कुछ समझ में नहीं आया। माताजी ने ही हमें मुश्किल से कहा, 'बेटा मुझे सरकारी अस्पताल ले चलो, तो माली और बहादुर दोनों रिक्शा में ले गए और साहब मैं मेम साहब का रास्ता देखने के लिए और आपको फोन करने के लिए घर पर रुक गया।'धनी व्यक्ति ने गुस्से एवं भारीपन से फोन रखा और लगभग दौड़ते हुए गाड़ी निकालकर तेज गति से सरकारी अस्पताल की ओर निकल पड़ा। जैसे ही रिसेप्शन की ओर बढ़ा, उसने सोचा कि यहीं से जानकारी ले लेता हूँ। 'सलाम साहब' एकाएक धनी व्यक्ति चौंका, उसे यहाँ कौन सलाम कर रहा है?
ND'अरे तुम वही गरीब लड़के हो?' और उसका हाथ पकड़े उसकी बूढ़ी माँ थी। धनी व्यक्ति ने आश्चर्य से पूछा, 'अरे तुम यहाँ, क्या बात है?' लड़का बोला, 'साहब, मेरी माँ बीमार थी। 15 दिनों से यहीं भर्ती थी। इसीलिए पैसे इकट्ठे करता था।' और ऊपर हाथ करके बोला, 'भगवान आप जैसे लोगों का भला करे जिनके आशीर्वाद से मेरी माँ ठीक हो गई। आज ही छुट्टी मिली है। घर जा रहा हूँ। मगर साहब आप यहाँ कैसे?' धनी व्यक्ति जैसे नींद से जागा हो। 'हाँ' कहकर वह रिसेप्शन की ओर बढ़ गया। वहाँ से जानकारी लेकर लंबे-लंबे कदम से आगे बढ़ता गया। सामने से उसे दो डॉक्टर आते मिले। उसने अपना परिचय दिया और माँ के बारे में पूछा।'ओ आई एम सॉरी, शी इज नो मोर, आपने बहुत देर कर दी' कहते हुए डॉक्टर आगे निकल गए। वह हारा-सा सिर पकड़ कर वहीं बेंच पर बैठ गया। सामने गरीब लड़का चला जा रहा था और उसके कंधे पर हाथ रखे धीरे-धीरे उसकी माँ जा रही थी।
स्वास्थ्यवर्धक करेला ड्रिंक
- अमिता शुक्ला
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NDसामग्री : 2-3 ताजे हरे करेले, 1 चुटकी सेंधा नमक, आधे नींबू का रस, 1 गिलास पानी, 2 टमाटर, 1 छोटा खीरा।विधि : करेला, टमाटर और खीरा तीनों को धोकर काट लें और पानी डालकर मिक्सर में घुमा लें। साफ कपड़े से छानकर नमक और नींबू मिलाकर पीएँ और पिलाएँ। यह ड्रिंक रक्त की शुद्धि कर पूरे शरीर में रक्त प्रवाह को सुचारु करता है। रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाता। मधुमेह के रोगियों के लिए लाभदायक है।
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मुख पृष्ठ » विविध » व्यंजन » भारतीय » दाल-सब्जी सूप (khana kajana)
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व्यंजन
सहजन के फूल साफ करके धो लें। कड़ाही में तेल गर्म करके हींग, राई जीरा एवं कटी...
आगे पढें...और भी
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व्यंजन
ND
बनाना रिफ्रेशर विद हनी
दूध में केले के टुकड़े डालें और मिक्सर में चला लें। इसमें संतरे का ज्यूस और शहद...
• कोल्ड फ्रूट्स क्रीम
• फटे दूध की पुडिंग
• मैदा-मेवे की टोकरी
• पुलेसाउटे मारीन्गो
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दाल-सब्जी सूप
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NDसामग्री : 50 ग्राम मूँग दाल, 200 ग्राम पालक, 100 ग्राम गाजर, 100 ग्राम मूली, हरा धनिया, 7-8 सलाद पत्ते, दो टमाटर, एक टी स्पून अदरक व एक प्याज (कटा हुआ), 100 ग्राम पनीर, आधा कप कोकोनट मिल्क (ताजा नारियल काट कर व आधा कप पानी डालकर मिक्सी में बारीक पीस कर तैयार किया हुआ), गरम मसाला, मक्खन, मिर्च, पुदीना पत्ती व नमक स्वादानुसार, दो टेबल स्पून कसा नारियल। विधि : पनीर को चौकोर टुकड़ों में काट लें। सब्जियों को धोकर बारीक काट लें। कुकर में मक्खन गर्म करके प्याज-अदरक डालकर भून लें। अब इसमें दाल, टमाटर और धनिया डाल दें। करीबन 10 मिनट तक पकाने के बाद ठंडा करके मिक्सी में बारीक पीस लें। अब बर्तन में डालकर बॉइल करें। और इसमें पनीर, सूखे मसाले और नारियल का दूध भी डाल कर कुछ देर पकाकर कसे नारियल से सजाकर पेश करें।
पुदीना बढ़ाएँ स्वाद...
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ND- पुदीने की पत्तियाँ सुखा लें, सूखने पर हाथों से मसलकर चलनी से छानकर रखें। इसे चिप्स के ऊपर बुरकें या आलू की सूखी सब्जी में मिलाएँ स्वाद बढ़ जाएगा।- मैथी की भाजी को सुखाकर प्रिजर्व कर साल भर इसका उपयोग आलू-मैथी की सब्जी बनाने में किया जा सकता है।- अंकुरित दाल को फ्रिज में रखने से पहले उसमें एक छोटा चम्मच नींबू का रस मिलाएँ। दाल की खुशबू फ्रिज में नहीं फैलेगी।- टमाटर के सूप में एक चम्मच नींबू का रस मिलाने से सूप का स्वाद बढ़ जाएगा।
- अमिता शुक्ला
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NDसामग्री : 2-3 ताजे हरे करेले, 1 चुटकी सेंधा नमक, आधे नींबू का रस, 1 गिलास पानी, 2 टमाटर, 1 छोटा खीरा।विधि : करेला, टमाटर और खीरा तीनों को धोकर काट लें और पानी डालकर मिक्सर में घुमा लें। साफ कपड़े से छानकर नमक और नींबू मिलाकर पीएँ और पिलाएँ। यह ड्रिंक रक्त की शुद्धि कर पूरे शरीर में रक्त प्रवाह को सुचारु करता है। रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाता। मधुमेह के रोगियों के लिए लाभदायक है।
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सहजन के फूल साफ करके धो लें। कड़ाही में तेल गर्म करके हींग, राई जीरा एवं कटी...
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बनाना रिफ्रेशर विद हनी
दूध में केले के टुकड़े डालें और मिक्सर में चला लें। इसमें संतरे का ज्यूस और शहद...
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दाल-सब्जी सूप
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NDसामग्री : 50 ग्राम मूँग दाल, 200 ग्राम पालक, 100 ग्राम गाजर, 100 ग्राम मूली, हरा धनिया, 7-8 सलाद पत्ते, दो टमाटर, एक टी स्पून अदरक व एक प्याज (कटा हुआ), 100 ग्राम पनीर, आधा कप कोकोनट मिल्क (ताजा नारियल काट कर व आधा कप पानी डालकर मिक्सी में बारीक पीस कर तैयार किया हुआ), गरम मसाला, मक्खन, मिर्च, पुदीना पत्ती व नमक स्वादानुसार, दो टेबल स्पून कसा नारियल। विधि : पनीर को चौकोर टुकड़ों में काट लें। सब्जियों को धोकर बारीक काट लें। कुकर में मक्खन गर्म करके प्याज-अदरक डालकर भून लें। अब इसमें दाल, टमाटर और धनिया डाल दें। करीबन 10 मिनट तक पकाने के बाद ठंडा करके मिक्सी में बारीक पीस लें। अब बर्तन में डालकर बॉइल करें। और इसमें पनीर, सूखे मसाले और नारियल का दूध भी डाल कर कुछ देर पकाकर कसे नारियल से सजाकर पेश करें।
पुदीना बढ़ाएँ स्वाद...
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ND- पुदीने की पत्तियाँ सुखा लें, सूखने पर हाथों से मसलकर चलनी से छानकर रखें। इसे चिप्स के ऊपर बुरकें या आलू की सूखी सब्जी में मिलाएँ स्वाद बढ़ जाएगा।- मैथी की भाजी को सुखाकर प्रिजर्व कर साल भर इसका उपयोग आलू-मैथी की सब्जी बनाने में किया जा सकता है।- अंकुरित दाल को फ्रिज में रखने से पहले उसमें एक छोटा चम्मच नींबू का रस मिलाएँ। दाल की खुशबू फ्रिज में नहीं फैलेगी।- टमाटर के सूप में एक चम्मच नींबू का रस मिलाने से सूप का स्वाद बढ़ जाएगा।
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